इंदिराजी का वह ओजस्वी भाषण

तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भारत की राजधानी दिल्ली में 28 से 30 अक्तूबर 1983 को हुआ। सम्मेलन के लिए बनी राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष डॉ. बलराम जाखड़ थे। 

सम्मेलन का बोधवाक्य  था- वसुधैव कुटुम्बकम। इसमें मॉरीशस से आए प्रतिनिधिमंडल ने भी हिस्सा लिया जिसके नेता श्री हरीश बुधू थे। सम्मेलन के आयोजन में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने भी प्रमुख भूमिका निभाई।

 सम्मेलन में कुल 6,566 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया जिनमें 260 विदेशों से आए प्रतिनिधि शामिल थे। 

  उद्घाटन समारोह

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उद्घाटन। साथ में हैं डॉ. बलराम जाखड़।

 उद्घाटन भाषण करती हुईं श्रीमती गांधी
(पढ़ें इंदिराजी का वह यादगार भाषण)

 डा. मेग्रेगर को सम्मानित करती हुईं श्रीमती महादेवी वर्मा

  श्री पी.वी. नरसिंह राव से विचार-विमर्श करते श्री मधुकर राव चौधरी

सम्मेलन को संबोधित करतीं महादेवीजी

 गोष्ठी में भाग लेते डा. ओदोलेन स्मेकल व अन्य विद्वान

 सम्मेलन के अवसर पर जारी डाक टिकट

तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया। हिंदी के विकास के प्रति अनन्य लगाव दिखाने वाले उनके ओजस्वी भाषण ने सबको प्रभावित किया।  समारोह की अध्यक्षता कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. आरएस मैंग्रेगर ने की। राष्ट्रीय समिति के कार्याध्यक्ष श्री मधुकर राव चौधरी ने स्वागत भाषण दिया। जिन अन्य प्रमुख वक्ताओं ने इस अवसर पर विचार प्रकट किए उनमें डॉ. बलराम जाखड़, लोकसभा अध्यक्ष, श्रीमती शीला कौल, तत्कालीन शिक्षा मंत्री, श्री श्रीकांत वर्मा, अध्यक्ष, प्रतिनिधि समिति, श्री हरीश बुधू, मॉरीशस प्रतिनिधिमंडल के नेता और श्री वियोगी हरि शामिल थे। श्री शंकरराव लोंढे, महामंत्री (संगठन) राष्ट्रीय समिति ने सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों के प्रति आभार ज्ञापन किया।

समापन समारोह

30 अक्तूबर 1983 को हुए समापन समारोह की अध्यक्षता डॉ. बलराम जाखड़ ने की। श्रीमती महादेवी वर्मा समापन समारोह की मुख्य वक्ता थीं। प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद ने स्वागत भाषण दिया। जिन अन्य वक्ताओं ने समापन समारोह में अपने विचार रखे, उनमें डॉ. चेलिशेव (रूस), श्री सोमदत्त बखौरी (मॉरीशस), ल्यूको नान (चीन), श्री मधुकर राव चौधरी, कार्याध्यक्ष, राष्ट्रीय समिति आदि प्रमुख थे। संगठन समिति के सचिव प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

शैक्षिक सत्र

सम्मेलन के दौरान आयोजित खुले अधिवेशनों में निम्न विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई-

- अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के प्रसार की संभावनाएं और प्रयास
- भारत के सांस्कृतिक संबंध और हिंदी
- मानव मूल्यों की स्थापना में हिंदी की भूमिका

इसके अलावा सम्मेलन में अनेक समानांतर गोष्ठी सत्र भी आयोजित किए गए। ये थे-

- आधुनिक भारत में हिंदी साहित्य की विकास शाखाएं
- आधुनिक भारत में हिंदी भाषा की प्रगति
- आधुनिक भारत में हिंदी की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति
- देवनागरी लिपिः स्वरूप और संभावनाएं
- आधुनिक भारत में हिंदी पत्रकारिता की प्रगति
- हिंदी के विकास में स्वैच्छित संस्थाओं का योगदान
- भारतीय मूल के जन समुदाय में हिंदी का प्रसारः समस्याएं और संभावनाएं
- विश्व के अन्य देशों में हिंदी का प्रचार-प्रसारः समस्याएं और संभावनाएं
- संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्तरराष्ट्रीय संगठनों में हिंदी का प्रयोगः संभावनाएं
- हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं- आदान-प्रदान (इस विषय पर अलग-अलग भाषाओं को लेते हुए छह समानांतर सत्र आयोजित किए गए)

प्रदर्शनी

तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान वृहत प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसके कई खंड थे। इन खंडों में हिंदी के बढ़ते चरण (प्रौद्योगिकी खंड), व्यवहार में हिंदी, हिंदी और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं की चित्रमय प्रदर्शनी, विदेशों में हिंदी, संचार माध्यम और देवनागरी लिपि, प्रकाशित पुस्तकों की प्रदर्शनी तथा रेल मंडप प्रदर्शनी शामिल थे।

सम्मानित विद्वान

सम्मेलन के दौरान कुल 41 विद्वानों को सम्मानित किया गया जिनमें 18 भारतीय भाषाओं के लेखक, सात अहिंदीभाषी हिंदी सेवी और विद्वान, आठ विदेशी हिंदी सेवी विद्वान तथा आठ अन्य हिंदी सेवी थे।

अन्य विशेषताएं

तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन में कत्थक गुरु पंडित बिरजू महाराज के संयोजन में 'कहानी कत्थक की'  नामक नृत्य नाटिका पेश की गई। मोहन राकेश रचित 'आषाढ़ का एक दिन'  नाटक का मंचन भी किया गया। इस अवसर पर लोक नृत्य, रासलीला एवं कवि सम्मेलन का आयोजन भी हुआ।

सम्मेलन में दो स्मारिकाओं 'विश्व हिंदी' तथा 'विश्व के मानचित्र पर हिंदी' का लोकार्पण किया गया। तीन अन्य प्रकाशनों 'भाषा',  'गगनांचल'  और  'अक्षरा' का लोकार्पण भी सम्पन्न हुआ।


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